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इतना न करो कातिल सुन्दर सी निगाहो मे

फूलो सा बदन उनका,काँटे हैजवानो मे
इतना करो कातिल,सुंदर सी निगाहो मे
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तू जान मेरी जन्नत तू रहती है साँसो मे
ये दिल है नही चौपड. लुट जो पाँसो मे
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प्यारी सी निगाहो तुम बादो करो हमसे
छोडेगे न हम तुमको, कस लेगे यू बाहो मे
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शीशे के है दरवाजे,पत्थर के मकानो मे
पंक्ति मे लगे देखो दारू की दुकानो मे
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ठुकराअो ना तडपाअो सताओ न यादो मे
अपना के जरा देखो तुम अपने इरादो मे
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कृष्णा क्या दिवाना है तू लाखो दिवानो मे
फूलो सा बदन उनका काटें है जवानो मे
?कृष्णकांत गुर्जर?

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कृष्णकांत गुर्जर
कृष्णकांत गुर्जर
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संप्रति - शिक्षक संचालक -G.v.n.school dungriya लेखन विधा- लेख, मुक्तक, कविता,ग़ज़ल,दोहे, लोकगीत भाषा शैली -...
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