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इजहार-ए-मुहब्बत

सन्दीप कुमार 'भारतीय'

सन्दीप कुमार 'भारतीय'

कविता

September 16, 2016

कुछ हर्फ़ रखे हैं मैंने
चुन कर लिफ़ाफ़े में
जो आते थे जुबां तक
और रुक जाते थे
कहना चाहता था मैं
मेरे लबों में सिमटकर रह गए
हर रोज बटोरता था मैं
यहाँ वहां से बिखरे हर्फ़
और फिर बुनता था
एक तानाबाना
काटछाँट करता था लफ्जों की
एक कुशल दर्जी की तरह
ताकि बन सके खूबसूरत सा
एक नज्म में ढला लिबास
सुनकर जिसको
हो जाओ तुम मदहोश
हो के बेखबर जहां से
कह दो मेरे दिल की बात
तुम्हारी जुबां से निकले
आब-ऐ-हयात मेरे दिल का
मिल जाए सुकून मेरी रूह को
मिट जाए बंधन जिस्मों का
एक हो जाएँ दो रूहें
मैं और तुम से बन जाएँ हम
मै नहीं चाहता करना इन्तजार
तुम कहो और मै सुनूँ
खुद ही कह देना चाहता हूँ
” इश्क है मुझे तुमसे
बेइन्तहा मुहब्बत है मुझे
क्या तुम भी करती हो
प्यार मुझसे ।
अपनाओगी मुझे”

” सन्दीप कुमार “

Author
सन्दीप कुमार 'भारतीय'
3 साझा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं | दो हाइकू पुस्तक है "साझा नभ का कोना" तथा "साझा संग्रह - शत हाइकुकार - साल शताब्दी" तीसरी पुस्तक तांका सदोका आधारित है "कलरव" | समय समय पर पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित होती... Read more
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