Apr 14, 2018 · कविता
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इंसान

यहां कभी मरा ना हिन्दू,
मरा नहीं मुसलमान यहां।
इन्सां की बन्दूक से मरा है,
सदा ही इन्सान यहां।।

आॅसू टपके ना सिक्खों के,
रोया नहीं ईसाई कभी।
दंगा किया नहीं बोद्ध ने,
रहे सिरफिरे दंगाई सभी।।

बलात्कार ना हुआ नारी का,
अस्मत लुटी इन्सानों की।
तुच्छ स्वार्थ के वशीभूत यहां,
बोली लगी भगवानों की ।।

इन्सा ने इन्सा को बेचा,
ऊॅची बोली लगा हाठ में।
नारी बन नारी को जलाकर,
नही रह सकी कभी ठाठ में।।

वशीबूत हो निजी स्वार्थ के ,
इन्सा ने बेच दिया जमीर।
उल्टे, झूठे पाप कर्म से,
इन्सा बनने लगा अमीर।।

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