** इंसान हो तुम **

प्रारम्भिक बोल
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कश्तियां यूं ही
डूबती रह जायेगी
होंसला है जिसके हाथ
वो पार सागर कर जायेगा
तर जायेगा बिन पतवार
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इंसान हो तुम
इंसान हो तुम
किनारे वही रह जायेंगे
मौजे कितना बुलायेगी
मांझी कब तक पुकारेगा
जीवन है चलने का नाम
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इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
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मत घबरा इन उलझनों से
एक दिन हो जायेगा पार
यार सुन अब दास्तां ग़म
कब तक ठहर पायेगा
जिद ना कर रुकने की अब
जीवन क्या ठहर जायेगा
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इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
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इक पहर थोड़ा ठहर
चल फिर मंजिल पायेगा
जो बिता उसको जाने दे
अब पछताये क्या हो पायेगा
है इंसान तूं ये समझ
कब तक तूं रुक पायेगा
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इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
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जीतेगा इकदिन हार के
जीवन को यूं वार के
इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
हां तुम इंसान हो ।।
?मधुप बैरागी

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