मुक्तक · Reading time: 1 minute

इंसानियत

किस कदर इंसानियत बहसी दरिंदा बन गई।
आदमी की आज देखो आदमी से ठन गई।।
मौत का ये खेल अब तो एक तमाशा हो गया।
आज रिश्तों की ये चादर फिर लहू में सन गई।।

1 Like · 29 Views
Like
You may also like:
Loading...