इंतजार करता है

अब फिर नहीं आऊंगा मन करता है
पर एक दिन और इंतजार करता है

बसंत से पतझड़ तक लगता जाता है
क्यों एक दिन और इंतजार करता है

सूरज की तपन से ठुठरन तक सहता है
ऐसे ही एक दिन और इंतजार करता है

हर जगह हर किसी का मकान बनता है
मकां का एक दिन और इंतजार करता है

हर बार हर राह में मुंह फेरे ही दिखता है
मुंह पलटने का एक टक इंतजार करता है

उम्र गुजरते ये हाड़ मांस सख्त हो गया है
जर्जर सा एक दिन और इंतजार करता है

अब ये इंतजार भी खत्म होता लगता है
रुकी सांस एक पल और इंतजार करता है

लक्ष्मण सिंह
जयपुर

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