घनाक्षरी · Reading time: 1 minute

आ गया बसंत काल

घनाक्षरी- १
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फिर नयी उमंग ले, आ गया बसंत काल।
गूंजता है आम्रकुंज, कोयल के गान से।
हर एक डाल डाल, खूब है रही मचल।
बसंतप्रिया कोकिला, गा रही है शान से।
कोंपलें नई नई हैं, डालियां सहम रही।
किन्तु मन खुशी भरा, शीत के प्रस्थान से।
है कृपा मां शारदे की, देखिए सभी जगह।
धन्य हो रहे नयन, मां कृपा महान से।
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घनाक्षरी- २
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गूंजने लगे हैं स्वर, भंवरों के चारों ओर।
खिलने लगे अनेक, पुष्प भांति भांति के।
सहसा ही भंग होती, जा रही एकाग्रता है।
दर्शन सुपावन हैं, सुप्रभात कांति के।
अलि का है राग प्रिय, बिन कोई साज बाज।
हो रहा गुंजायमान, है बिना विश्रांति के।
प्रकृति के वशीभूत, मँडरा रहे मधुप।
दूत हैं सौंदर्य के ये, स्नेह भाव शांति के।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य

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