आज़ाद गज़ल

बड़ी खामोशी से

सपने टूटते हैं बड़ी खामोशी से
अपने लूटते हैं बड़ी खामोशी से ।
ज़र,जोरू या जमीन की खातीर
रिश्ते छूटते हैं बड़ी खामोशी से ।
कुदरत का कहर, वक्त की मार
हालात कूटते हैं बड़ी खामोशी से ।
करते जिनसे उम्मीद हैं मनाने की
वोही रूठते हैं बड़ी खामोशी से ।
हैसीयत बदलते ही हाथों से हाथ
अक़्सर छूटते हैं बड़ी खामोशी से ।
-अजय प्रसाद
AJAY PRASAD TGT ENGLISH DAV PS PGC BIHARSHARIF NALANDA BIHAR 9006233052.

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