Aug 1, 2016 · मुक्तक
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आसरा

जिंदगी के हर ज़हर को मय समझकर पी गया,
दर्द जब हद से बढ़ा तो होंठ अपने सी गया,
मौत कितनी बार मेरे पास आई ऐ”चिराग़”,
इक तेरे दीदार की ख़ातिर अभी तक जी गया।

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Deepesh Dwivedi
Deepesh Dwivedi
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साहित्य,दर्शन एवं अध्यात्म मे विशेष रुचि। 34 वर्षो से राजभाषा कार्मिक। गृहपत्रिका एवं सामयीकियों मे... View full profile
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