आशीष

आशीष माँ तेरा ही था..
लेखनी को जो मेरी बल मिला….
अल्फाज उभरे जेहन में ऐसे….
नित नया आयाम मिला …
सम्बल मिला….ऐसा मुझे..
कि हर हालात में संवर गई……
बिखरी टूटी हिम्मत भी तो..
उँगली थाम सीखों की तेरी..
हर बुराई से मैं गुज़र गई।
माँ तू नहीं है अब ,
तेरे आँचल की छांव..
मैं. . हर पल महसूस करती हूँ….
तेरे ही स्नेहाशीषों में अब
ये जीवन बसर करती हूँ।
निधि

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