आल्हा/ वीर

सुमिरू तुमको हंसवाहिनी,मनमोहन,गुरुवर, गिरिराज ।
पंचदेव, गृहदेव, इष्ट जी,मंगल करना सारे काज ।।

बाल नवीन करे विनती यह,रखना देवो मेरी लाज ।
उर भीतर के भाव लिखूँ मैं,आल्हा छंद संग ले आज ।।

देश,वेश,परिवेश बदल दो,सोच बिना कछु नही सुहाय ।
मधुर बोल मन प्यारे होते,देते वह सब को हर्षाय ।।

मन पीड़ा है मन से भारी,मनन करो मारग मिल जाय ।
आत्म बोध चिंतन से मिलता,जो करते वह लेते पाय ।।

क्षणिक सुंदरी काया माया,डाले बैठी भ्रम का जाल ।
जो इनके पाशे में पड़ते,उनका अंत बुरा ही हाल ।।

आशय क्या जीवन का समझो,जो तुमको है सुख की चाह ।
राम नाम धन साँचो जग में,ध्यान धरे तर जाता काह ।।

दया धर्म मन के आभूषण,धारे मन सुंदर हो जाय ।
यश समृध्दि मान बढ़े अरु,अंत ईश को लेता पाय ।।

नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
श्रोत्रिय निवास बयाना

ब्लॉग विजिट करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद Thank you For Visit.

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