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आला-रे-आला

डी. के. निवातिया

डी. के. निवातिया

कविता

November 3, 2017

आला-रे-आला

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आला-रे-आला, सुन मेरे लाला, लगा ले अपनी जुबान पे ताला
जो बोलेगा सच्ची सच्ची बाते, किया जायेगा उसका मुँह काला

वतन व्यवस्था का टूटा पलंग है
चरमारती अर्थव्यवस्था बेढंग है
ढीला अपना कुर्ता पतलून तंग है
टूटी हुई गाडी का दमकता रंग है
वजीर-ऐ-आला फिर भी मलंग है

आला-रे-आला, सुन मेरे लाला, लगा ले अपनी जुबान पे ताला
जो बोलेगा सच्ची सच्ची बाते, किया जायेगा उसका मुँह काला

झूठ के तेल में पकते है इनके वादे
कहते है कुछ ये,कुछ और है इरादे
कीमती लिबास में दिखते है सादे
फटे कुर्ते में निकलते है साहबज़ादे
राजन भी करने लगे, अब झूठे वादे

आला-रे-आला, सुन मेरे लाला, लगा ले अपनी जुबान पे ताला
जो बोलेगा सच्ची सच्ची बाते, किया जायेगा उसका मुँह काला

डाकिये से शादी की,वक़्त पे खत मिले नहीं
इश्क मूक गुजर गया, ओठ जरा हिले नहीं
कीचड खूब बनाये, मगर कमल खिले नहीं
सत्य अंहिंसा संग चले पर गांधी मिले नहीं
झूठ बोलकर खूब नचाया, बंदर थे नचे नहीं

आला-रे-आला, सुन मेरे लाला, लगा ले अपनी जुबान पे ताला
जो बोलेगा सच्ची सच्ची बाते, किया जायेगा उसका मुँह काला

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डी के निवातिया

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Author
डी. के. निवातिया
नाम: डी. के. निवातिया पिता का नाम : श्री जयप्रकाश जन्म स्थान : मेरठ , उत्तर प्रदेश (भारत) शिक्षा: एम. ए., बी.एड. रूचि :- लेखन एव पाठन कार्य समस्त कवियों, लेखको एवं पाठको के द्वारा प्राप्त टिप्पणी एव सुझावों का... Read more
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