आलस

||विधाता छंद ||
विधान – २८ मात्रा, १४- १४ मात्रा पर यति,चार चरण, दो दो चरण समतुकांत, अंत गुरु गुरु !
( १,८,१५ व २२ वी मात्रा लघु)
1222 1222 1222 1222

मिला तेरा सहारा हैं , तुफां भी पार हो जाएँ !
खुदा का नाम प्यारा हैं, दिलों में रोशनी आएँ !
मुझे हे श्याम तेरा ही , रहा विश्वास नाता है !
गुरू के रूप में पाया , नया उल्लास आता हैं !!

छगन लाल गर्ग विज्ञ !

विषय – आलस !
विधा – विधाता छंद

मिला है आशियाना तो , घिरी है नींद की छाया !
बसी है रोशनी ऊर्जा , जहाँ हो चैन की माया !
तजो आलस भरी दुनिया, चलो ढूँढे किनारा भी !
प्रभा के तेज से सारा , हरेगा तिमिर कारा भी !!

निराशा के क्षणों में भी , जगी है प्यार की आशा !
बसी है रोशनी ऊर्जा , भले हो दर्द की भाषा !
तजो आलस भरी दुनिया, चलो छोड़ो बहाना भी !
उषा की लालिमा में हो , धरा का हर तराना भी!

यहाँ हैं थोक में आँसू, बहाना भी सजा होगी !
मिले हैं फर्ज में सारे , दिखाते हैं सदा ढोंगी !
बहा दो वक्त से इनको, मिटेगा राग माया से !
उठो जागो बनो चेतन, करो तो काम काया से !!

लगा हैं हर जुबां ताला , हवा का जोश अंधा है!
डरो मत और भी ज्यादा, निशाधर ठोस कंधा हैं!
सुनो यह काल है भारी , निभाओ हौशियारी में !
तजो हर वक्त आलस को ,क्रिया हो प्रीत प्यारी में !!

छगन लाल गर्ग विज्ञ!

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