आरक्षण

आरक्षण
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पहन के चश्मा रेबन
मंहगी बुलेट सवारी
सजी स्वर्ण आभूषण।

और उफ्फ! ये फैशन
फिर करती बुलंद नारे
दे दो हमें तुम आरक्षण।

उनके लिए था आरक्षण
जो आर्थिक,समाजिक
झेल रहे थे पिछड़ापन।

तब समय की मांग थी
जनजन की पुकार थी
इसलिए मिला आरक्षण।

वक्त अब बदल चुका है
जीवन सम्भल चुका है
फिर भी क्यूँ आरक्षण।

पिछड़े तो आगे हो गए
अगड़े ही पीछे हो गए
हो रही प्रतिभा का हनन।

आर्थिक कमजोर को
खूब सबल बनाओ ना
सुधारो ना उनका जीवन।

जो सक्षम अब हो चुके
लाभ आरक्षण ले चुके
अब न करो उनका चयन।

आर्थिक आधार बनाओ न
समानता अधिकार लाओ न
बहुत पिछड़े हैं अब भी सवर्ण।

सब को खड़े पांव कराओ न
बैसाखी अब तो उन्हें बांटो ना
पंगु न कर दो उनका जीवन।

सबने झेला ये दंश बहुत
मिला सबको ये अंश बहुत
खत्म हो जातीय आरक्षण।

पता है सियासी वोट तन्त्र है
कुर्सी पाने का ठोस मन्त्र है
अब तो करो पुर्णाहुति हवन।
खत्म करो जातीय आरक्षण।

—-पंकज प्रियम
3.4.2018

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