Feb 6, 2017 · कविता

आरक्षण

जबतक आरक्षण भारी है,छुआछूत भी जारी है

जागो नींद से मित्रों बगावत की ये बारी है

किस हक को वो खोज रहे, कबतक कुत्तों की मौज रहे

ऐसा ना हो भारत में बस नाकाबिलों फौज रहे

घुटघुटकर ना तुम जिया करो, छुआछूत भी किया करो

कबतक सहोगे यूँ ही थोड़ा बदला सदला लिया करो

आज सबसे हम ये कहते है, बेवजह नहीं सब सहते है

भारतीय है हम इसलिए अपने दायरे तक में रहते है

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