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आरक्षण

Govind Kurmi

Govind Kurmi

कविता

February 6, 2017

जबतक आरक्षण भारी है,छुआछूत भी जारी है

जागो नींद से मित्रों बगावत की ये बारी है

किस हक को वो खोज रहे, कबतक कुत्तों की मौज रहे

ऐसा ना हो भारत में बस नाकाबिलों फौज रहे

घुटघुटकर ना तुम जिया करो, छुआछूत भी किया करो

कबतक सहोगे यूँ ही थोड़ा बदला सदला लिया करो

आज सबसे हम ये कहते है, बेवजह नहीं सब सहते है

भारतीय है हम इसलिए अपने दायरे तक में रहते है

Author
Govind Kurmi
गौर के शहर में खबर बन गया हूँ । १लड़की के प्यार में शायर बन गया हूँ ।
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