कविता · Reading time: 1 minute

आया नया साल

भारत की
संस्कृति में सन्निहित
पुरातन ग्रन्थों के
अनुसार
पावन मास चैत्र
पक्ष शुक्ल प्रथमा
आता नव वर्ष हमारा
और
है कहा गया
किया था विधाता ने भी
इस पुनीत तिथि
प्रवर्तित जीवन चक्र
सृष्टि का
किन्तु
वसुधैव कुटुम्ब
या कहें वैश्वीकरण
ही है कारण
कि नव वर्ष आगमन
मनाएं आज
एक जनवरी को
प्रत्येक वर्ष
प्रतिच्छाया ही है
पाश्चात्य
सभ्यता की यह
दे रहे हम भी बधाई
हो शुभ्र व शुभ
यह नूतन आगन्तुक वर्ष
जैसे होता प्रवेश
इस नव वर्ष का
संग-संग
कंपित थर-थर
मलय शीतल
गुनगुनी रश्मि-धारें भी
जाड़े की धूप भी
संतप्त मार्तण्ड भी
दिखे
आभासित मयंक-सा
शीतल और धुमिल
हैं ज्यों छाईं
पादप-पादप
पुष्प-पुष्प
गाछ-गाछ
वल्लरि-वल्लरि
नगीने-सी जड़ाऊ
हीरक बुंदियां तुषार की
हो वैसे ही
शीतलता मानव हृदयों में
हर जीवन में
हो शांत नीहार वृष्टि
का स्पर्श कोमल
स्पंदित प्रमुदित हो
हर मन
और
प्रकाशमान हो
प्रगति जनता जनार्दन की सूर्य-सी
प्रखर हो प्रतिपल सविता की प्रदीप्त आभा से
सबकी जीवन बगिया
है यही शुभेच्छा
हैं मंगलकामनाएं हैं अशेष
यह नव वर्ष
सर्व जन हिताय
करे कुछ विशेष।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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