आमियाँ

डॉक्टर पंत जी अस्पताल से अपना ओपीडी निपटा कर दोपहर में जब घर में घुसे तो खाने की मेज पर कुछ कच्ची हरी आमियाँ रखी देखकर उन्हें अजीब लगा , क्योंकि ऊंचाई वाले पहाड़ों पर चीड़ और देवदार से घिरे क्षेत्रों में आम के पेड़ नहीं पाए जाते हैं और ऐसी आमियाँ मौसम आने पर मैदानी क्षेत्रों जैसे हल्द्वानी या रामनगर से मंगाकर कुछ सब्जी वाले अपने पास बेचने के लिये रख लेते हैं ।
अतः ये देख उन्होंने अपनी पत्नी डॉक्टर ( मिसेस ) पंत से पूूंछा
ये आमियाँ कहां से आई ? कौन दे गया ?
पति की यह बात सुनकर हंसते हुए वो बोलीं
‘ कुछ दिन पहले मैं ओपीडी में बैठकर नमक लगाकर कच्ची आमियाँ काट कर चाट चाट कर खा रही थी , जिसको कि उनकी किसी मरीज़ा ने उन्हें खाते हुए देख लिया था और आज जब वह उन्हें फिर से ओपीडी में दिखाने आई तो अपने साथ कहीं से ढूंढ कर ये आमियाँ मंगवा कर उन्हें दे गई थी । पिछली बार उनको आमियाँ खाते देख उसने इसका यह अर्थ निकाला कि उन्हें प्रेगनेंसी है इसलिए उन्हें आमियाँ पसंद है और आज वो ये आमियाँ मेरे लिए दे गई थी। हालांकि बाद में उसे धन्यवाद देते हुए उन्होंने उस महिला का शक दूर कर दिया था ‘
यह बात सुनकर डॉक्टर पंत जी विवाह पूर्व की पुरानी यादों में खो गए जब वे दोनों मेडिकल कॉलेज में इंटर्नशिप कर रहे थे । एक दिन तेज़ धूप में चिलचिलाती गर्मी से भरी दोपहरिया में जब मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठी मैडम पंत जी ने उनसे तेज प्यास लगने के कारण कहीं पानी पीने के लिए रुकने की इच्छा जताई और इसके लिए वे लोग उस शहर में पास के किसी चौराहे पर एक जगह पर हलवाई , फल वालों , वेल्डर ,पान की और मैकेनिक आदि की दुकानों के बीच स्थित एक लस्सी कोल्ड ड्रिंक वाले की दुकान में घुस गए और दो गिलास लस्सी का ऑर्डर देकर वहां अपनी बारी का इंतजार करने लगे । थोड़ी देर बाद लस्सी वाले ने लस्सी बनाकर उन दोनों को थमा दी और जितनी देर पंत जी ने अपना लस्सी का गिलास खत्म किया उतनी देर में मैडम पन्त जी उस लस्सी का 1 – 2 घूंट ही बमुश्किल से पी पाई थीं । इससे पहले की कि जी कुछ समझ पाते मैडम पंत जी ने भक्क से पी हुई लस्सी की एक उर्ध्वगामी ( प्रोजेक्टाइल ) उल्टी कर डाली जिसके पदार्थ एवम छींटे आसपास की लगी मेज कुर्सियों और उन पर बैठकर लस्सी पी रहे लोगों के ऊपर छटक कर बिखर गई । पंत जी यह दृश्य देखकर सकपका गए थे ।लेकिन वहां उस समय उस दुकानदार और आसपास बैठे लोगों ने बहुत ही सद्भावना के साथ , कोई बात नहीं , कोई बात नहीं कहते हुए अपनी अपनी जगह से खड़े होकर दूर हट गए और फिर मैडम पन्त जी भी अपना लस्सी से भरा गिलास बिना पिये वही काउंटर पर छोड़कर बाहर आ गईं । पंत जी भी उनके पीछे पीछे बाहर आने लगे तभी पीछे से दो-तीन लोगों की सहानुभूति से भरी आवाज पंत जी को सुनाई पड़ी
‘ बेटा ऐसी हालत में तुमको इन्हें मोटरसाइकिल पर बैठा कर ऐसी जगहों पर घुमाने नहीं लाना चाहिए ।’
पंत जी सिर झुका कर दुम दबाकर उस दुकान से चुपचाप बाहर निकल कर आ गये और अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट कर मैडम पंत को पीछे बैठाया और अपने कॉलेज परिसर की और चल दिए ।
थोड़ा दूर चलने पर उन्होंने मैडम पंत जी से पूछा
‘ तुमने वहां लस्सी पी कर सबके ऊपर उल्टी क्यों कर दी ?
इस पर मैडम पन्त जी बोलीं
‘ तुमने ऐसी गंदी जगह लस्सी पीने के लिए मोटरसाइकिल क्यों रोकी , वहां पहले से ही इतनी मक्खियां भिन्नभिना रहीं थीं और वहीं पर सामने की टेबल पर बैठा एक बड़ी-बड़ी मूछों वाला अधेड़ मुच्छड़ एक बड़े से गिलास में लस्सी पी रहा था और उसकी बढ़ी बढ़ी मूंछें उसके लस्सी के गिलास में आधी डूबी हुई थीं और फिर जैसे ही उसने लस्सी पीते हुए गिलास हटाकर अपनी मूछों पर लगी लस्सी को चाटा यह दृश्य देखकर उन्हें अचानक उल्टी हो गई । ‘
फिर थोड़े से अंतराल के बाद पंत जी से मैडम पन्त जी से पूंछा
‘ तुम्हें पता है वह लोग वहां तुमसे क्या कह रहे थे ?
पंत जी के मौन रहने पर मैडम पंत जी ने उन्हें समझाया कि
‘ वे लोग यह समझ रहे थे कि मुझे प्रेगनेंसी है और इस हालत में लेकर तुम मुझे घुमा रहे हो ‘
अचानक मोटरसाइकिल चलाते चलाते उनके रोंगटे खड़े हो गए । वह सोचने लगे कि अच्छा हुआ इतने से शक और सलाह पर जान छूटी और किसी ने इसके आगे कुछ किया या कहा नहीं । अगर वहां इकट्ठा लोगों को यह पता चल जाता कि अभी इन दोनों का अभी विवाह तक नहीं हुआ है तो उन लोगों की सारी की सारी सद्भावना एवं सद्व्यवहार धरा का धरा रह जाता और वो कितना पिटते सो अलग ।
आज फिर खाने की मेज पर रखी आमियों को अपलक निहारते हुए पंत जी यही सोच रहे थे कि ये हरी , कच्ची , खट्टी , आमियाँ जो न कराएं वह थोड़ा है ।

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