गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

आप अपने हो मेरे दिल को जलाते क्यूँ हो

आप अपने हो मेरे दिल को जलाते क्यूँ हो
पास आते भी नहीं इतना सताते क्यूँ हो

है कोई बात अगर हम से छिपाते क्यूँ हो
ख़ुद भी रोकर के हमें और रुलाते क्यूँ हो

दूर जाना था अगर पास बुलाते क्यूँ हो
तिश्नगी इश्क़ की हर बार बढ़ाते क्यूँ हो

जबकि मालूम है ताबीर नहीं हो सकती
फ़िर उसी ख़्वाब को पलकों पे सजाते क्यूँ हो

मयक़दा जाम नहीं और न साक़ी है कोई
जाम आँखों से हमें आप पिलाते क्यूँ हो

कर के वादा न निभाते हो न आते हो सनम
इस तरह दिल को मेरे रोज़ दुखाते क्यूँ हो

क्या शिकायत ज़रा हमको बताओ तो कभी
यूँ जला दीप मुहब्बत का बुझाते क्यूँ हो

सादगी चीज़ बड़ी है न अना ये बेहतर
सर न झुक जाए कहीं सर को उठाते क्यूँ हो

दिल के सहरा में समुन्दर न कोई दरिया है
प्यास ‘आनन्द’ मुहब्बत की लगाते क्यूँ हो

– डॉ आनन्द किशोर

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