Aug 27, 2016 · कविता
Reading time: 1 minute

आनदं की खोज मैं

क्यों जूझ रहा इंसान आनदं की खोज मैं,
गवाँ बैठा है होश दुनिया की चकाचौंध मैं,
भटका है जो डगर विकत लहरो की मौज मैं,
जैसे उठती हो मृगतृष्णा कस्तूरी की खोज में. ll

दिन को चैन मिले न रात को आराम,
सरपट दौड़ता अश्व सा जीवन को ठेलता,
फिक्रमंद है, तनावपूर्ण भी, कैसे पाये,
खो रही जो मुस्कान, विलासिता की होड़ में. ll

यंहा ढूंढे, वंहा ढूंढे,जाने क्यों ढूंढे मुर्द आबादी में,
बंगले में ना गाडी में,मिलेगी सोने में ना चाँदी में,
ये तो अनमोल प्रसाद भोली भाली दुआओ का,
जो बिकती नहीं सौगात, दौलत के बाजार में. ll

भूल गया अब तो पता भी ईश के द्वार का,
मिलता है सच्चा सुख जिसकी आगोश में,
पाना है आनद जो, त्याग मोह अतिलोभ का,
मिल सकता है जो तुमको प्रकृति की गोद में. ll

आनंद तो अनुभूति है खोज सके तो खोज ले
मिल ना सकेगी शैतानो की अंधाधुंध घुड़दौड़ मैं
व्यर्थ है ये धन दौलत,कुछ अंत समय की सोच ले
यही जीवन है आनंद का आधार परिपूर्ण कर मौज ले ll

———-::डी. के. निवातियाँ::——–

16 Views
Copy link to share
डी. के. निवातिया
235 Posts · 49.6k Views
Follow 12 Followers
नाम: डी. के. निवातिया पिता का नाम : श्री जयप्रकाश जन्म स्थान : मेरठ ,... View full profile
You may also like: