आधुनिक शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन

श्री राजेश व्यास अनुनय के लेख शीर्षक शिक्षा और आधुनिकता दिनांक 21 अगस्त पर विवेचना। comment box में स्थानाभाव के कारण अलग पोस्ट करने पर बाध्य :

आपके कथन से मैं सहमत हूं कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है हमें किताबी ज्ञान की अपेक्षा व्यवहारिक ज्ञान पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है । शिक्षा प्रणाली में विभिन्न क्षेत्रों में व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करने के लिए पाठ्यक्रम का समावेश आवश्यक है। हमें ग्रामीण क्षेत्रों में व्यवहारिक शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित करना होगा। जो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं व्यवसाय के अवसर प्रदान करने में सक्षम सिद्ध हो सके। जिससे ग्रामीण युवाओं को शिक्षित होने के पश्चात शहर की ओर नौकरी की तलाश में भटकना न पड़े। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योग धंधे एवं सेवा क्षेत्रों में विकास से ग्रामीण युवाओं को ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार एवं व्यवसाय के अवसर उपलब्ध होंगे और उनका पलायन शहरी क्षेत्रों की ओर नहीं होगा। युवा शक्तियों के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति में भी काफी सुधार की संभावनाएं हैं।
हमें ग्रामीण क्षेत्रों की जनता इस सोच में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है कि युवाओं का भविष्य शहरी क्षेत्रों में ही निहित है। हमें उस मानसिकता में भी परिवर्तन लाना है जिसमें व्यवसाय से अधिक नौकरी को महत्व दिया जाता है। दरअसल हमारे देश की जनता में नौकरी को भविष्य की सुरक्षा का मूल मंत्र मान लिया गया है।
और व्यवसाय को जोखिम भरा असुरक्षित विकल्प माना गया है। वास्तविकता में वर्तमान में नौकरी भी असुरक्षा से परे नहीं है। आधुनिक युवा नौकरी में अपने को सुरक्षित महसूस करता है और यह मानसिकता है कि नौकरी में अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। यद्यपि यह सत्य नहीं है। व्यवसाय में युवा प्रतिभा का विकास होता है और प्रतिभाशाली परिश्रमी युवा सफल व्यवसायी सिद्ध होते हैं।
हमें युवाओं में परिश्रम करने एवं जोखिम उठाने की क्षमता का विकास करना होगा तभी हम युवाओं को नौकरी पर निर्भर न रहकर व्यवसाय हेतु प्रेरित कर सकेंगे। जनसंख्या के विस्तार एवं शिक्षित युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी फलस्वरूप शासन द्वारा संभव नहीं है कि समस्त शिक्षित युवाओं को रोजगार प्रदान कर सके। हमें इस तथ्य को स्वीकार करना पड़ेगा और युवा बेरोजगारी के लिए केवल सरकार पर दोषारोपण करना उचित नहीं है। कुछ हद तक जनता की मानसिकता भी इसके लिए दोषी है।
अतः व्यवहारिक ज्ञान का महत्व किताबी ज्ञान की अपेक्षा सर्वोपरि है।

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