*** " आधुनिकता के असर.......! " ***

* न रहा अब जंगल ,
अब न रहा ओ अमरैय्य की शीतल छांव।
न झरनों की कल-कल छल-छल ,
और न ही नदी पर बहती अब नाव।
न कहीं पीपल की ,
न कहीं बरगद की सुकुन भारी ठंडी छांव।
चिलचिलाती धूप से भैय्या ,
जलता है अब अपना पांव।
होती थी कभी जहाँ चौपाल ,
बन गया है वहाँ मधुशाला।
लेकर घुट ” गरल ” की प्याला ,
होंश में न रहा ,अब अपना नंदलाला।
मदिरा-मय की धार में , तू – तू मैं – मैं की बौछार में ;
बिखर गया अब ,अपना मधुवन-सा नंदन गाँव।
** न कहीं छत पर गौरय्या रानी ,
और न किसी दर पर मटके में पानी।
न कहीं लटकी हुई होती, किसी घर में धान की बाली ।
सूरज की किरणों में है तपन,अब इतनी ;
कितना भरूँ भटकों में पानी , हो जाती है मिनटों में
खाली।
न कहीं कोयल की कुहक ,
न कहीं मयूरी की मनोरम झलक।
और अब न कहीं कलरव करती , चिड़ियों की चहक।
न कहीं हरियाली की अनुपम रौनक ,
और अब न कहीं शीतल चंदन की महक।
धुल और प्रदूषण के हैं, इतनी असर ;
हर जगह-जगह पर है ,अब बिमारियों के क़हर।
है शोरगुल और पराबैंगनी किरणों के हर जगह पर आगाज़।
छिद्र हो गया है ” ओजोन परत ” ,
और कैंसर कर रहा है हम सब पर राज।
कहीं-कहीं पर है जो बाग-बगीचे ,
छुपा-छूपी खेलते हैं जिसके पिछे बच्चे ;
औद्योगिक प्रतिष्ठान की प्रतिकार से कट रहा है वह सब आज।

*** होती थी जहाँ किलकारियाँ ,
हर ओ गाँव टूट कर बन गया शहर।
और कहते हैं देखो भैय्या ,
हो गये हम कितने प्रखर।
ये आधुनिकता की उपज ,
वैज्ञानिकता की गरज।
कर गई हमको विवश ,
और प्रदूषित हवाओं से ;
बुझ रही है अपना जीवन कलश।
CO , CO2 और SO2 की है इतनी क़हर ;
पर्यावरण पर , अब घुल गया जहर ।
देख लिया हमनें, प्रकृति को छेड़ने का असर ;
धरातल पर घट रहा है अब जल स्तर।
तप रहा है जल-थल , सीमा लांघ रहा है सागर तल।
पिघल रहा है हिम-शिखर ,
और जलमग्न हो रहा है अब अपना घर।
मुझे क्या पता..? , ” विकास ” की गति ;
” पलायन” वेग से भी है अधिक।
शायद ” प्रगति पुष्पक विमान ” भी , अब परिक्रमा कर रहा है;
” यमलोक ” के करीब-करीब या नज़दीक।
यारों हो सकता है , यह मेरे पागल मन की विचार ;
पर .. लगता अब यही है , ” यमराज जी ” कर जायेंगे धरती पर ,
अपना अधिकार।
और हम सब ” यमदूत ” के इशारों पर लगायेंगे , ” यमराज ” की
– जय जय कार।
फिर मिट जायेगा ” मनु ” का सारा परिवार ।
फिर मिट जायेगा ” मनु ” का सारा परिवार।।
आधुनिकता की इस जंगल से ,
अब तो कोई हमें निकाले।
भौतिकता की नशा छोड़ ,
” मेरे गाँव को अब तो मुझे कोई लौटा दे। “
” मेरे गाँव को अब तो मुझे कोई लौटा दे।। “
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* बी पी पटेल *
बिलासपुर ( छ.ग. )

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