आदम

#आदम
जब तक वो भूखा था
जब तक वो झुका था
जब तक वो रोता था
जब तक अपनों को वो खोता था
जब तक उसके बदन से
पसीने के बदले खून बहता था
जब तक वो अपने दर्द को कहता था
तब तक मुझे फर्क नहीं पड़ता था

जब मेरी आंते ऎठी
जब दर्द मेरे कमर में बैठी
जब आंखो ने मेरे नीर बहाए
जब हाथों ने अपनों के अर्थी उठाए
जब अपने मस्तक से
पसीने के बदले रक्त बहा था
जब बदन हमरा दर्द से दोहरा हुआ था
जब मेरे चौखट पे मौत का पहरा हुआ था
तब जा के थोड़ा थोड़ा पता चला था
वो भी आदम ही था…
जो धर्म में मुझ से अलग खड़ा था
उसका पीर भी उतना ही बड़ा था
जितना कि मेरे हिस्से में बदा था
वो भी पानी, मिट्टी, आकाश,
आग और हवा से ही बना था
वो भी तो वैसे ही मरा था
जिस तरह मैं मरा था
बस वो मिट्टी के नीचे दबा था
और मैं अग्नि के भेट चढ़ा था
जात धरम के अलावा
उसमे मुझे न कोई भेद पड़ा था
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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