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आदमी में गांव

Neelam Naveen

Neelam Naveen "Neel"

कविता

February 24, 2017

किसी पुरानी किताब
के कई छुटे पन्ने धुमिल
स्याही के आखरों जैसे
क्ई गांव बुड़ा गये और
कुछ पलायन में खो गये,
व निगल गयी आधुनिकता !
सही में विकास की राह
कई बार बेमानी होती है
सीधे सरल लोग जो हैं
गुम  जाते व खो जाते हैं
और कौन न रिझेगा सपने सरीखी
बातों से, गर पढ लिख जायेंगें !
पुराने बुढे गांव भी एकबार
पहल कर जायेंगें, यदि
भुल से कदम बढ जाते
उन पगडंडियों में कभी
तो टुटे बचे अवशेष आज
कई कहानियां कहती हैं !
कहीं मौन सहमति में लोग
अनायास आज को गले
लगाने के हौसले बस
चाहे अनचाहे ही सही
अब बुलंद कर रहे हैं
मन के लिबास बदल रहे हैं !
बस बातों में गावं कभी
राजनीति ,कभी  धर्म  में,
बजट पालिसी के पन्नों
व विकास की भाषा से
गरीब की पीठ में चने भुनते
बड़े ही फल फूल रहे हैं !
जहां मिट्टी कुरेदो उधर एक
नया उगता नेता,और पद हैं,
पदों की  चाह राह में वादे 
फिर विकास टटोलता आदम
ऐसे ही गांव में कहीं आदमी
आदमी में गांव शायद बचा है !!!!!!

नीलम  “नील” Date 7.10.16

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Author
Neelam Naveen
शिक्षा : पोस्ट ग्रेजूऐट अंग्रेजी साहित्य तथा सोसियल वर्क में । कृति: सांझा संकलन (काव्य रचनाएँ ),अखंड भारत पत्रिका (काव्य रचनाएँ एवं लेख ) तथा अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । स्थान : अल्मोडा

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