आदमी तो आदमी है सिर्फ आदमी

हर वक्त हर रोज परेशां है आदमी
कहीँ उनसे कही खुद से परेशां है आदमी।।

नियति का सर्वश्रेष्ट है उपहार आदमी
पर औरो से कही ज्यादा परेशां है आदमी ।।

किसने किया गुनाह सजा किसको है मिली
खुद अपने गुनाह से है गुनहगार आदमी ।।

आए थे सज सवंर के लिए हसरतों का संग
एक रोटी की चाह ने ही तो मारा है आदमी ।।

क्यों सच से दूर ख्वाब सजाता है आदमी
पर मरने के बाद भी तो भटकता है आदमी।।

गर मान लेता जान लेता सच को आदमी
कि आदमी तो आदमी है सिर्फ आदमी।।

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