आदमी तो आदमी है सिर्फ आदमी

हर वक्त हर रोज परेशां है आदमी
कहीँ उनसे कही खुद से परेशां है आदमी।।

नियति का सर्वश्रेष्ट है उपहार आदमी
पर औरो से कही ज्यादा परेशां है आदमी ।।

किसने किया गुनाह सजा किसको है मिली
खुद अपने गुनाह से है गुनहगार आदमी ।।

आए थे सज सवंर के लिए हसरतों का संग
एक रोटी की चाह ने ही तो मारा है आदमी ।।

क्यों सच से दूर ख्वाब सजाता है आदमी
पर मरने के बाद भी तो भटकता है आदमी।।

गर मान लेता जान लेता सच को आदमी
कि आदमी तो आदमी है सिर्फ आदमी।।

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 147

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share