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आदमी खुद को ही छलने लगा है, हवाओं में ज़हर घुलने लगा है।

अनुराग दीक्षित

अनुराग दीक्षित

कविता

November 13, 2017

आदमी खुद को ही छलने लगा है,
हवाओं में ज़हर घुलने लगा है।***
पहुँचना चाँद तारों तक मुबारक बात है,
कलेजा भूमि का फटने लगा है
बाँधे नासिका देखो हमारी पीढियाँ घूमें,
यही सौग़ात है बाकी हमें दिखने लगा है
आदमी खुद को ही छलने लगा है,
हवाओं में ज़हर घुलने लगा है।***
बना डाले हैं हमने खूब सारे ईंट के जंगल,
किया पर्यावरण का नाश दो-दो हाथ कर दंगल
जल दूषित, हवा दूषित ज़मीं औ आसमां दूषित
अब तो खुद ही अपना आशियां जलने लगा है,
आदमी खुद को ही छलने लगा है,
हवाओं में ज़हर घुलने लगा है।***
दिन में रात हो जैसे तिमिर का नाश हो कैसे,
हमारी राजधानी को मिले आकाश अब कैसे,
वैश्विक ऊष्मायन दिन व दिन बढने लगा है,
हिमालय आग से गलने लगा है
आदमी खुद को ही छलने लगा है,
हवाओं में ज़हर घुलने लगा है।***

Author
अनुराग दीक्षित
मेरा जन्म फर्रुखाबाद के कमालगंज ब्लॉक के ग्राम कंझाना में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ,मैंने वनस्पति विज्ञानं में एमएससी,ऍम.ए. समाजशाह्स्त्र एवं एडवरटाइजिंग पब्लिक रिलेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया,व जन स्वास्थ्य में,परास्नातक डिप्लोमा किया, विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशन एवं... Read more
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