आदमी के काम आना आदमी का काम है

आदमी के काम आना आदमी का काम है
देखना क्या रात या दिन दोपहर या शाम है

डूब जाता है सफ़ीना साहिलों के पास आ
बस भँवर बेकार में ही हो रहा बदनाम है

क्या ग़ज़ब तिश्नालबी है बुझ न पाई आज तक
प्यास होठों पर सजी है दूर लब से ज़ाम है

इश्क़ के किस्से किताबों में सिमटकर रह गये
अब न कोई हीर राँझा गुलबदन गुलफ़ाम है

चाँद की धरती पे जाकर लौट तो आया मगर
भीड़ में दुनिया की अब तक आदमी गुमनाम है

लोग क्या क्या नाम रखते हैं मुहब्बत का यहाँ
इश्क़ इस दुनिया में दिल के दर्द का पैग़ाम है

लोग जो चाहे कहें बज़्में अदब को जान लो
आप सबके प्यार का बज़्में अदब इक नाम है

राकेश दुबे “गुलशन”
23/07/2016
बरेली

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