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आत्महत्या

Mahendra singh kiroula

Mahendra singh kiroula

कविता

January 23, 2017

चार औरतें कोने मे
परस्पर करती बात
सकरपुर की उस गली मे
उस रोज काली भयंकर रात

ब्याकुल सारे लोग थे लेकिन
वो छोटा बच्चा रोता था
आज लद गया बोझ से कन्धा
जिस प्रहर रोज वो सोता था

माँ बहिन को सम्भाला पर
खुद को न संभाल सका
मृतक की सारी रस्म निभा कर
अग्नि मुश्किल से डाल सका

छुटकारा ही पाने को
जो गया उसका श्रम ख़त्म हुआ
आशाओ के माल थे जपते
माया का ये भ्रम ख़त्म हुआ

जिम्मेदारी ठुकरा करके
समाज नियमावली भंग हुई
नन्हे कंधो को यु झुका देखकर
आँखे मेरी दंग हुई

पीड़ जीवन मे उमड़ी इतनी
भाग गए हम संघर्ष छोड़कर
मौत को अपनी संगिनी बनाकर
परिवार का अपार हर्ष छोड़कर

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