कविता · Reading time: 1 minute

आत्ममुग्धता से लेकर, अंधभक्ति तक!!

आत्ममुग्धता से लेकर अंधभक्ति तक
पराकाष्ठा के शिखर पर
रहने को आतुर
आत्मावलोकन की दरकार है!

चल रहा है द्वंध
अंदर ही अंदर,
किन्तु स्वीकारना
दंभ से भरे हुए
इस मानुष को
कहां स्वीकार है!

बस इसी मृगतृष्णा में
विचरण करने को हैं
मजबूर!
चले आएं हैं बहुत दूर
और लौटना भी चाहें तो
वो, लौटने नहीं देते!

क्यूं?
जानते हुए भी
हम उन्हीं के साथ
हां में सिर हिला कर
चल पड़ते हैं
उसी राह पर
भाग्य के भरोसे
जो होगा देखा जायेगा!

यह नियति सी बन गई है
हमारी!
बुद्धि-बिवेक से आगे बढ़ कर
कुतर्क का सहारा लेकर
अपने किए को
जायज ठहराने की हद तक
चल पड़े हैं हम
अपने ही बुने जाल में
उलझने और फंसने के लिए!!

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