लघु कथा · Reading time: 3 minutes

आत्मज्ञान

झबरी बिल्ली कई दिनों से चूहे खा-खाकर उकता गई थी। रोज़ वही मांस, वही स्वाद। लानत है ऐसी ज़िंदगी पर। आज कुछ नया होना चाहिए। तभी उसके क़रीब से एक चूहा तेज़ी से भागते हुए निकला, झबरी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। चूहा झबरी के इस बदले व्यवहार पर हैरान था।

ख़ैर, झबरी वहाँ से किसी नए शिकार की तलाश में चल पड़ी। कुछ दूर चलने पर उसे सुस्त क़दम से चलता हुआ एक ऊँट दिखाई दिया। काश! ये विशालकाय जीव कहीं मरा हुआ मिल जाए तो, छह महीने तक मुझे शिकार ढूढ़ने की ज़रूरत न पड़े। इसका गोश्त कभी खाया नहीं! निःसंदेह बड़ा स्वादिष्ट होता होगा। वह ऐसा सोच रही थी, तभी सामने एक काला कुत्ता उसकी तरफ़ लपका। अब झबरी की जान पे बन आयी। कहाँ वह ऊँट का गोश्त खाने का सोच रही थी और कहाँ ये आफ़त आ टपकी! ‘भाग झबरी नहीं तो तेरी मौत आज तय है!’ ऐसा विचारकर झबरी आनन-फानन में भागी और क़िस्मत से नज़दीक आम का एक बड़ा वृक्ष था। जिस पर चढ़ने में किसी तरह झबरी ने सफलता पाई, और उसकी जान में जान आई। अब कुत्ता वृक्ष के नीचे से खड़ा-खड़ा भौंकने लगा। पेड़ पर एक कबूतर जोड़ा बैठा था। जो झबरी को पेड़ पर चढ़ता देख, उड़ गया था। झबरी ने सोचा, “काश! वो कबूतर का जोड़ा, आज उसका भोजन बन जाता तो कितना लज़ीज़ भोजन होता। एक लम्बा अरसा गुज़र गया, कबूतर का मीट खाये। जब कुत्ता भौंक-भौंककर थक गया तो वह अपने रास्ते चल दिया, किसी नए शिकार की तरफ़। जब झबरी को यक़ीन हो गया की कुत्ता अब नहीं लौटेगा, तो झबरी नीचे उतर आई।

शहर में कोई और कुत्ता न मिल जाये, इसलिए अब झबरी जंगल की तरफ़ चल पड़ी। काफ़ी भटकने के बाद, उसे सामने एक खरगोश फुदकता हुआ दिखाई दिया। झबरी की जिव्हा पर लार टपकने लगी। जीवन भर उसने खरगोश का गोश्त नहीं खाया था। अतः उसे पाने के लिए वह लालायित हो उठी, मगर सुबह से लगातार पूरा दिन दौड़-धूप करते-करते उसकी काफ़ी ऊर्जा ख़र्च हो चुकी थी। जब तक वह खरगोश के पास पहुंची, वह लम्बी छलांगे मारता हुआ, उससे दूर निकल चुका था और घनी झाड़ियों के बीच कहीं विलुप्त हो गया था। झबरी अब झाड़ियों के इर्द-गिर्द किसी अन्य शिकार को ढूंढने लगी कि उसके सामने किंग कोबरा साँप फन उठाये खड़ा हो गया। झबरी के प्राण पुनः हलक में आ गए। अतः झबरी के हृदय में अब भय का संचार हुआ और दुम दबाकर उसने जंगल से निकलने में ही अपनी भलाई समझी।

शाम को अपने निवास स्थान पर वापिस पहुँचते-पहुँचते झबरी काफ़ी थक चुकी थी और उसे जोरों की भूख भी लग आई थी। वापिस आई थकी-हारी झबरी को देखकर चूहे ने सोचा, अब झबरी संत हो गई है, शिकार नहीं कर रही है। चूहे ने एक बार फिर झबरी के सामने से निकलने की ठानी। जैसे ही चूहा उसके क़रीब पहुंचा, उसने चूहे को पकड़ लिया और चूहे को खाकर अपनी भूख शान्त करने लगी। आज उसे चूहे का गोश्त ही बेहद स्वादिष्ट लग रहा था। अतः झबरी अब समझ गई थी कि ख़याली पुलाव पकाने और व्यर्थ इधर-उधर भटकने से कोई लाभ नहीं है। भोजन करते-करते उसे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ, “जो उपलब्ध है… वही पर्याप्त है।”

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