आतिशे इश्क से है गुजरना मुझे

ग़ज़ल-(बहर्-मुतदारिक मुसम्मन सालिम)
मापनी-212 212 212 212
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आतिशे इश्क़ से है गुज़रना मुझे।।
अब जो कुंदन सा भी तो निख़रना मुझे।।

गेसुओं में ये गजरा सजा लीजिए।
बन के ख़ुशबू फ़ज़ा में बिख़रना मुझे।।

ज़ोर तूफां का है दूर साहिल भी है।
पार दरिया के भी तो उतरना मुझे।।

आइने तोड़ मैने दिये घर के सब।
आंख में ही तेरी अब संवरना मुझे।।

आंधियां अब चलें या गिरे बिजलियां।
कौल है वस्ल का न मुकरना मुझे।।

“अनीश” अब मुसाफ़िर न कोई गिरे ।
राह में रोशनी बन बिख़रना मुझे।।
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आतिशे इश्क़=प्रेम की आग ।वस्ल=मिलन ।कौल=बचन

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