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आतंकवाद

डा. सूर्यनारायण पाण्डेय

डा. सूर्यनारायण पाण्डेय

कविता

February 18, 2017

आतंकवाद,
उफ़!
धागों की तरह उलझ गए हैं लोग
हिंसा के अभिनन्दन में
नहीं…नहीं…नहीं
शायद इसलिए कि
महान समीप्यपूर्ण एकता को छोड़
मृत्यु को गले लगा रहें हैं लोग
मैं पूछता हूँ-
आखिर तूने येसा किया ही क्यों ?
क्या मिलता है ?
आतंकवाद फ़ैलाने में-
क्या हुआ है तुम्हे ?
जो इस भीड़ में अपने पराये हो गए हो
चंद लम्हों की ख़ुशी
भाती नहीं क्या ?
अस्तु,
डूबती संध्या को
चुपके से रिझाओ
शांति मनाओ
पंकिल परिवेश से
समेट स्वच्छ माटी नम
दीप गढ़ो,
नेह भरो,
त्यागो मन के विभ्रम
पर मैं अपने को सुलझाऊ कैसे ?
जबकि विवश हैं हम अब भी,
हिंसा के अभिनन्दन में.
आतंकवाद को आतंक से
सुलझाने की कोशिश
किधर ले जा रहा है
शांति को.
कितना हास्यास्पद है
अशांति की टक्कर पर शांति रखकर
आतंकवाद कम करने का दावा करना.

Author
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 1000 से अधिक लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। 'कर्फ्यू में शहर' काव्य संग्रह मित्र प्रकाशन, कोलकाता के सहयोग से प्रकाशित। सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन, दिल्ली : सम्पूर्ण अध्ययन, वेस्ट बंगाल : एट ए ग्लांस जैसी... Read more
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