आज शहर सँवरा है मेरा...

आज शहर सँवरा है मेरा,
नवेली दुल्हन की तरहां ।
ख़बर कैसे निज़ाम की लग गयी,
बेजुबाँ चमन को किस तरह ।।

हर तरफ़ शोर मचा ऐसे,
कि जैसे कुछ होने वाला हो ।
बैचेनी में हैं सभी सिपहसलार,
फसे है जैसे अनचाहे शौहरत की तरह ।।

पड़े थे जो सदियों से सूखे,
आज चमक उनमें आयी है ।
निज़ाम के क़दमों तले झुकने की,
क़सम बेमुरब्बत ने खाई है ।।

उम्मीदें पाल रहे वो भी,
जिन्हें न पूछता कोई ।
वो अपने इब्ना को लेकर,
पैरोकार बन शरण निज़ाम के आये हैं ।।

एक निठल्ला पूरे चमन का दल्ला,
बन पहरेदार खड़ा है ।
“आघात” चमन क्या कल ऐसा था ,
जो सजा आज दुल्हन की तरह ।।

*आर एस बौध्द “आघात”
अलीगढ़

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