आज दुनियाँ बन गई बाजार है. (गीतिका)

गीतिका
छंद-आनंद-वर्धक,
मापनी- २१२२,२१२२,२१२ ।
(गालगागा,गालगागा,गालगा)
सीमान्त- आर, पदान्त- है ।

गीतिका

आज दुनियाँ बन गई बाजार है ।
आदमी को लाभ की द़रक़ार है ।
भाड़ में जाए धरम, इंसानियत ,
इस तरह चलती यहाँ सरकार है ।
मौत के काँटे बिछे हर राह में ,
घृणा की ही यहाँ पर भरमार है ।
हर तरह अन्याय करते जो यहाँ ,
मिला उनको न्याय का अधिकार है ।
खनकते हैं स्वर्ण के सिक्के वहाँ ,
जहाँ पर पाज़ेब की झनकार है ।
मिटे को ही सब मिटाते हैं यहाँ ,
उग रहे सूरज की जय-जय-कार है ।
ज़िंदग़ी चलती ख़ुदा तेरे भरोसे ,
हुआ मुझको तुझसे बेहद़ प्यार है ।

ईश्वर दयाल गोस्वामी ।
कवि,शिक्षक ।

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