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आज तन पर प्राण भारी

Sonit Bopche

Sonit Bopche

कविता

January 29, 2017

आज तन पर प्राण भारी

मन हुआ स्वच्छन्द जैसे
तोड़ सारे बंध जैसे
देह की परिधि में सिमटे अब नहीं यह रूह सारी
आज तन पर प्राण भारी

लोक क्या परलोक क्या अब
घोर तम आलोक क्या अब
मैं समाहित सृष्टि में अब, और सृष्टि मुझमे सारी
आज तन पर प्राण भारी

वेश क्या परिवेश क्या अब
धर्म जाति शेष क्या अब
सत्य शिव सुन्दर इसी में सब विलय इस्से ही जारी
आज तन पर प्राण भारी

और तुम मैं भी भला क्या
किस लिए अब यह छलावा
एक ही तो आग से उठती है लपटें ढेर सारी
आज तन पर प्राण भारी

                                  -सोनित

Author
Sonit Bopche
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