" आज गगन में , मैं इतराउं " !!

गीत

नीर भरी कारी बदरी हूँ ,
आज गगन में , मैं इतराउं ।
डोल रहे हैं रीते बदरा ,
उनसे जाकर होड़ लगाऊं ।।

देख रही हूं हलचल नभ में ,
कैसी भागमभाग मची है ।
धरती प्यासी जग है प्यासा ,
पानी की जो मांग उठी है ।
इंद्र देव फरमान सुनाते ,
मैं भी जा आदेश निभाऊं ।।

उजरे बदरा खाली दौड़े ,
जनता ज्यादा चाह करे है ।
नदिया , पोखर रीते रीते ,
ठंडी ठंडी आह भरे है ।
आस लिये नज़रें उठती हैं ,
कैसे खुद पर रोक लगाऊं ।।

संगी साथी खोज रही हूं ,
जो धरती की ओर है जाएं ।
मेरे संग घनघोर घटा बन ,
जी भर पानी बरसा आएं ।
प्यासों की जब प्यास बुझेगी ,
अपनी छाती ठंडक पाऊँ ।।

जब बरसी हूँ आन धरा पर ,
जाने कितने हिय हरषे हैं ।
बच्चे नाचें ता ता थैया ,
सबके मन खिल खिल उठे हैं ।
मोर पपीहा , चातक हरषे ,
सबकी प्यास बुझाती आऊं ।।

रंगत मैंने काली पायी ,
भेदभाव भी खूब सहा है ।
काजल से काली कह डाला ,
नयनों से भी नीर बहा है ।
मैं बरसी तो स्वागत पाया ,
अपना कर्म निभाये जाऊँ ।।

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

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