Skip to content

आज के इन्सान को गरजते देखा।

लक्ष्मी सिंह

लक्ष्मी सिंह

कविता

February 14, 2017

?????
आज के इन्सान को
गरजते देखा।
बेवजह हमहरते देखा।
अपनी ही गलती पर
शर्मिन्दगी की जगह
चिखते चिल्लाते देखा।
अपनी गलती को
ढकने के लिए
नीच की श्रेणी से भी
नीचे गिरते देखा।
चोरी करके भी
सीनाजोड़ी करते देखा।
आज के इन्सान को
गरजते देखा।
खड़े थे दो पैरों पर,
लेकिन लड़खड़ाते देखा।
ये क्या संस्कार देगें
अपने बच्चों को।
जिन्हें खुद ही
संस्कारहीनता से
नीचे गिरते देखा।
बच्चों के भविष्य को
स्वार्थलिप्त अधर में
डूबते देखा।
खुद की नजरों में
उसे गिरते देखा।
आज के इन्सान को
गरजते देखा।
बेवजह हमहरते देखा।
?- लक्ष्मी सिंह?

Share this:
Author
लक्ष्मी सिंह
MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is a available on major sites like Flipkart, Amazon,24by7 publishing site. Please visit my blog lakshmisingh.blogspot.com( Darpan) This is my collection of poems and stories. Thank... Read more

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you