आज की जिंदगी

गजल
जिन्दगी ए शहर जहन्नुम बनती जा रही है
जिधर देखिये आग ही उगलती जा रही है

जल रही जिंदगी को ज़रा सा शांत करने में
हर तरफ और अधिक सुलगती जा रही है

आदमी से आदमियत ने बेवफाई कर ली
पूरी दुनिया इस कदर बिगड़ती जा रही है

वक्त किसी को नही जान ले वो कैसे जीते हैं
जिंदगियां रोज़ जिनकी बिलखती जा रही है

जिक्र जिनका हर ख़ुत्बा ए वजीर करता है
औलादें उनकी रोज भूंख से मरती जा रही है

“निर्झर”तलाश कर तू जिंदगी में “जिंदगी”को
पकड़ इसे तुझसे दिन रात बिछड़ती जा रही है

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