Skip to content

आज कि जिन्दगी

Jaikrishan Uniyal

Jaikrishan Uniyal

कविता

January 11, 2018

मैं, जा रहा था ,सडक के उस पार,
देख गाडियों कि रफ्तार,
प्रतिक्षा करता रहा,खाली सडक का,
तब जाके वह पल आया,
जब सडक, को खाली पाया,
मैने जाने को कदम बढाया ही था, कि,
कुछ आता हुआ दिखा,
मैने,कदम ताल तेज करनी चाही,
पर खडे रहने से,पैर अकडे थे भारी,
लडखडाते हुए मै आगे बढता गया,
तभी मुझे एक स्वर सुनाई दिया,
ऐ लगडे,सडक पर तो ठीक से चल ले,
मैने,हाँफते हुए कहा,तुझे मैं लगडा दिखाइ देता हूँ,
वह बोला,लंगडा नहीं है तो,ठीक से क्यों नही चलता है रे, बे,
मैने,गुररा कर कहा,कुछ लिहाज भी है,
वह बोला,वही तो कर रहा हूँ,
नही तो,अब तक सडक पर पडा होता,
यह तो खैर मना,कि मेरी निगाह सडक पर ही थी,
कहीं और देख रहा होता, तो तु क्या करता,
मरता, अरे तु जरुर मरता ,
और मरके भी किसी के काम न आया होता,
मैने झुझंला कर एतराज जताया,
वह बोला,घर से झगड के चला था क्या,
या कहीं से पीके आया है,
अरे यह तो अच्छा है,कि मै मदहोश नही था,
वर्ना,पहिया फुटपाथ पर भी चढता है,
क्या,तुने पढा,सुना नही है,
हर रोज सडक पर मरते हैं लोग,
टकरा के गिर कर,घसीटते हुए तडफते हैं,लोग,
सवेंदनाओं को भूलकर आगे बढते हैं लोग,
कैसी राह पर अब चल पडे हैं लोग,
किसी के घर का दिया बुझे तो बुझे,
कोइ किसी कि राह देखे तो देखें,
कहीं किसी का चुल्हा जले न जले,
सवेंदनओं से परे,चल पडे हैं लोग,
बस यही रह गयी है,आज कि जिन्दगी,
हाय, कैसी बदरगं हो गयी है,ये जिन्दगी।

Share this:
Author
Jaikrishan Uniyal
सामाजिक कार्यकर्ता,पुर्व ॻाम प्रधान
Recommended for you