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आज किस बेटी की बारी है

रामबन्धु वत्स

रामबन्धु वत्स

कविता

January 29, 2017

हर माँ-बाप का मन भारी है,
आज किस बेटी की बारी है I

घर से निकली प्यारी अपने सपनों के साथ,
पता नहीं कब क्या होगा उसके साथ I
कानों में फिर गूंजी चित्कार ,
आँखों में पानी है ।
आज किस बेटी की बारी है I

अपनी बेटी की ,
अपनो ने छिनी आबरू ,
बेबश बेकार लाचार है यह ज़िन्दगी
अरे, यह सड़क का नंगा शव तो
हमारी अपनी दुलारी है ।
अब! किस बेटी की बारी है I

हार गयी ज़िन्दगी ,
जीती दरिंदगी ,
लहुलुहान इज्जत हम सबको धिक्कारती,
खून की हर बुंद को चुपचाप पीती दामिनी है ।
आज किस बेटी की बारी है ।

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