आज का समाज

आज समाज का ताना बाना टूटता जा रहा है,
छोटी छोटी बातों पर सिर फूटता जा रहा है।

देखो आज भाई का दुश्मन भाई बन बैठा है,
इंसानियत का दामन पीछे छूटता जा रहा है।

बहन बेटी को घर बुलाकर खुश नहीं कोई,
बेवजह हर कोई अपनों से रूठता जा रहा है।

माँ बाप को वृद्धाश्रम भेज कर खुश हैं आज,
देख हालात ईश्वर से भरोसा उठता जा रहा है।

एक बेटे की चाहत में बेटियों को मरवा दिया,
अब बेटे की शादी के लिए घूमता जा रहा है।

परिवारों की परिभाषाएं बदल गयी हैं अब,
इंसान स्वार्थ की दलदल में डूबता जा रहा है।

नफरत का जहर घुल गया आब ओ हवा में,
रिश्तों की बदहाली देख दम घुटता जा रहा है।

पैसे की कद्र बस, कीमत घट गयी इंसान की,
इज्जत घटती और पैसा जुड़ता जा रहा है।

आधुनिकता के कारण बस दिखावा रह गया,
रीति रिवाज अपने इंसान भूलता जा रहा है।

आओ कोशिश करें हम संस्कारों को बचाने की,
सुलक्षणा का लिखा शब्द शब्द गूँजता जा रहा है।

©® सर्वाधिकार डॉ सुलक्षणा अहलावत के पास सुरक्षित हैं।

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