आज़ादी के परवाने

कब तलक यह धरती पापों का बोझ सहेगी
मां कब तक जख्मों को लेकर चुप रहेगी।

आजाद भारत का सपना लेकर आए थे वो
तुम जैसे ही जवान धरती पर आए थे जो।

क्या खुद के सपनों को जीने का हक नहीं था
क्यों भारत की आजादी का सपना सोच के आए थे वो।

पैसों का लालच ना था ना थी ऐशो आराम की चिंता
ख्वाबों में भी बुना करता क्यों स्वतंत्र भारत का सपना।

क्या खेल नहीं सकते थे वह गुड्डे गुड़ियों का खेल
क्यों इंकलाब का नारा लगाकर हंसते गए जेल।

क्या प्यारी नहीं थी उन्हें मां की ममता और दुलार
क्यों झेल गया सीने पर दुश्मन की गोलियां हजार।

आज तो मात्तृ भूम भी तड़प रही उन्हें याद कर
कहां सो गए हो जवान जिन्होंने तोड़ दिए वह हाथ जो उठे थे उनकी मां पर।

हंस के लगाया था गले जिन्होंने फंदे को
मानो उस दिन किसी दुल्हन ने फूलों का हार डाला हो दूल्हे को।

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