आजकल का प्यार

वर्तमान समय में प्रेम को पुनः परिभाषित करने की महती आवश्यकता है।आजकल का प्रेम बहुत ही अल्पकालीन होता जा रहा हे।किसी को किसी से प्रेम हो जाता हे और दोनों अपने जीवन को लेकर हसीन सपने देखते हे।दोनों का प्रेम परवान चढ़ ही रहा होता है कि कुछ महीनो बाद अचानक से दोनों में सम्बन्ध विच्छेद हो जाता हे। या फिर दोनों के बीच शीतयुद्ध आरम्भ हो जाता हे।
ऐसे में इस समस्या की जड़ में जाने की जरुरत हे की ऐसा क्यों हुआ? पहली बात यह हे कि जिसको आप प्रेम कह रहे हो वो प्रेम नहीं हे बल्कि आकर्षण मात्र है।और आकर्षण भी केवल शारीरिक।ऐसे में जब धीरे धीरे एक दूसरे हे आतंरिक गुणों की परते खुलती हे तो समझ में आने लगता हे कि वस्तुतः प्रेम तो था ही नहीं।

दूसरी बात यह होती हे कि प्रेम में त्याग की भावना होनी चाहिए परन्तु आज के लोगो में त्याग की अपेक्षा स्वार्थ की भावना अधिक प्रबल होती हे।जब स्वार्थ की पूर्ति हो जाती हे अथवा नहीं हो पाती हे,दोनों ही अवस्था में प्रेम सम्बन्ध नष्ट हो जाते हे।

और तीसरी चीज जो सामने आती हे वह ये हे कि हम अपने प्रेमी को मूलरूप में स्वीकार ना करके उसे बदलने का प्रयास करने लगते हे ,उसको अपने साँचे में ढालने का प्रयास करते हे और इसी कारण हम उसे खो देते हे।

इसलिए प्रेम शब्द को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता हे।

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