कविता · Reading time: 1 minute

— आग —

आग ऐसी जली
कि बुझने का नाम नही ले रही
रोजाना न जाने
कितने जल रहे शमशान
ये बुझने का नाम नही ले रही
घर घर से उठ रहे
अनगिनत से तूफ़ान
यह बुझने का नाम नही ले रही
कब तक रहेगा ये
घमासान थमने का नाम नही ले रही
अनसुलझे से छोड़ रही सवाल
यह रूकने का नाम नही ले रही
आगे आगे न जाने कैसा हो अंजाम
यह बुझने का नाम नही ले रही

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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शिक्षा : एम्.ए (राजनीति शास्त्र), दवा कंपनी में एकाउंट्स मेनेजर, कविता, शायरी, गायन, चित्रकारी की रूचि है , Books: तीन कविता साहित्यापेडिया में प्रकाशित हुई है..यही मेरा सौभाग्य रहा है…
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