कविता · Reading time: 1 minute

आग………..

आग…..

हमने कई रूपो मे देखा इसको ,
कभी हसांती ये कभी रूलाती है,
यदि हृदय मे लग जाये किसी के
जीते जी तन – बदन जलाती है।

घर – घर का दीपक बनकर
रोशन करती है कोना-कोना
अगर बने नफरत की चिंगारी
महलो को खाक मे मिलाती है।।

प्रणय वेदी पर होती प्रज्वलित
पवित्र हवन कुडं मे सजती है,
शमशान मे बनकर दाग देह का
नश्नर शरीर भस्म कर जाती है ।।

इतनी सयानी, इतनी चपल ये
चिगांरी से शोला बन जाती है
हर एक शै: को राख बनाकर
दुनिया भर मे धाक जमाती है ।।

उष्मीयता का अपना ही गुण
जीवन कारक मानी जाती है
हर आँगन के चूल्हे जलकर
मानस पेट की आग बुझाती है ।।

विभत्स रूप ऐसा भी देखा
जब दिल ये दहला जाती है
बहू रूप मेे किसी के आँगंन
जब एक बेटी जलाई जाती है ।।

जन्मकाल हो या हो मृत्यू काल
घर मे पूजा हो या कोई अनुष्ठान
हर खुशी हर गम की साक्षी बन
अग्नि नाम से पहचानी जाती है ।।




डी. के. निवातियॉ ________@,

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