May 6, 2020 · कविता
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आगे आओ इन्हें संभालो

ये जो मेरे मजदूर भाई-बहन सड़कों पर भटक रहे है
सब की आंखो में बड़ा ही खटक रहे है

उन को क्या बता रहे हो बलिदान कैसा होता है
धूप में सड़क पर नंगे पांव चल के उन का हृदय रोता है
बड़ी बडीं बातें कर के सभी अपनी ज़िम्मेवारी से पल्ला झटक रहे है
ये तो मेरे मजदूर भाई-बहन सड़कों पर भटक रहे है

कुछ दिन चल के जो घर ना पहुंच पाए
क्या किसी को उन की पीड़ा ना सताए
किसी गरीब के लिए उचित फैसले इतने क्यों लटक रहे है
ये मेरे मजदूर भाई-बहन सड़कों पर भटक रहे है

कहां गए वो देश के नारे
दर -दर भटके ये बेचारे
कोई ना इन का बने सहारा
फिरते है ये मारे- मारे
अपना कर्तव्य दूसरे पे डाल के धीरे धीरे सारे सटक रहे है
ये मेरे मजदूर भाई-बहन सड़कों पर क्यों भटक रहे है

जरा सोचो और देखो भालो
इस मुशिकल का कोई हल निकालो
ये भी भारत मां के भी बच्चे है
अगले आओ इन्हें संभालो
ये हीआदि और अंत से सरिषटी के घटक रहे है

ये तो मेरे मजदूर भाई-बहन सड़कों पर भटक रहे
सब की आंखो में बड़ा ही खटक रहे है।

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Monika Sharma
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