लघु कथा · Reading time: 3 minutes

आक्रोश

कोई मोबाइल पर व्यस्त था तो कोई गप्पों में लीन। कुछ चौधरी टाइप लोग प्रॉपर्टी डीलिंग की बातों में व्यस्त थे तो कुछ वर्तमान राजनीति पर टीका-टिप्पणी करने में मसरूफ़। ये नज़ारा था देहरादून पब्लिक स्कूल (गोविंदपुरम, ग़ाज़ियाबाद) के बाहर प्रतीक्षारत खड़े अभिभावकों के हाव-भाव का। जो फुटपाथ पर खड़े बच्चों के पेपर ख़त्म होने का इन्तिज़ार कर रहे थे। फुटपाथ के एक छोर पर कतारवद्ध खड़ी स्कूल की दर्ज़न भर बसें स्कूल के वैभव को दर्शाने का काम कर रही थीं। उस पर स्कूल का लम्बा-चौड़ा हरा-भरा पार्क, यह साबित करता था कि विद्यालय प्रबंधन उच्च कोटि का है। कहने की ज़रुरत नहीं कि स्कूल की इस साज-सज्जा और लम्बे-चौड़े स्टाफ़ को रखने के लिए शहर की जानी-मानी और मालदार असामी बच्चे के स्कूल में प्रवेश के वक्त कितनी डोनेशन देते होंगे।

“वाह! इस स्कूल की शोभा तो देखते ही बनती है। खूबसूरत बिल्डिंग तमाम सुविधाओं से युक्त।” एक ने टिप्पणी की।

“अजी क्या स्कूल है? सब कमाई का गोरखधंधा है। जितने भी प्राइवेट स्कूल हैं, पढाई के नाम पर शून्य हैं।” दूसरे ने तीखी प्रतिक्रिया की।

“पांचवी कक्षा तक जितना दे चुके हैं। इससे कम में तो हमने अपने ज़माने में बी ए पास कर लिया था।” तीसरे सज्जन जो मेरे बग़ल में हाथ में हेलमेट थामे खड़े थे। यकायक बौखलाकर बोले।

“आपका नाम!” मैंने उनसे प्रश्न किया।

“जी ओमप्रकाश!” उस सज्जन ने कहा, “इन्टर करने के बाद बेकार हैं ये सब। दिमाग़ से ख़त्म है आज की नई पीढ़ी। बस कहने को डिग्री मिल जाएगी कि बारहवीं पास है।”

“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?” मैंने पुनः प्रश्नात्मक लहज़े में कहा।

“अरे मेरे दिए हुए सवाल हल नहीं कर पाते हैं ये। एक को भी फार्मूला याद नहीं है। बस अंग्रेजी के दो-चार अक्षर गिटर-पिटर बोल लेते हैं। रात-दिन मोबाइल पर ही वक्त गुज़रते हैं।”

“क्या करें ज़माने के हिसाब से अप-टू-डेट नहीं रहेंगे तो पीछे हो जायेंगे। इंटरनेट का ज़माना है।” मैंने टिप्पणी की।

“लानत है आज के ज़माने को। मैं पचास पार हो गया हूँ मगर इनमे से कोई भी पट्ठा मुझे दौड़ में पछाड़ कर दिखा दे। पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर गांव में हमारा स्कूल था। रोज़ दौड़ते हुए पौने-एक घंटे में पहुँच जाते थे। और आज के बच्चे चार कदम चलने में भी हाँपने लांगते हैं।”

“लो बच्चों की छुट्टी हो गई ओमप्रकाश भाईसाहब। वो देखो हरेभरे पार्क से निकलते बच्चे कितने सुन्दर लग रहे हैं।” मैंने बच्चों की ओर देखते हुए कहा। पीछे देखा तो ओमप्रकाश जी नहीं दिखाई दिए। चारों तरफ़ अभिभावकों की भीड़ ही भीड़ थी जो बाहर निकलते हुए अपने-अपने बच्चों को खोज रहे थे। मैं भी अपनी बच्ची को खोजने लगा। अचानक मेरी निगाह सामने से आ रही बाइक पर पड़ी। वह ओमप्रकाश था। उसके पीछे जो बच्चा बैठा था वह जन्म से अपाहिज जान पड़ता था। उसके कमर से नीचे का हिस्सा अविकसित रह गया था। मुझे ओमप्रकाश के हृदय में उपजे ‘आक्रोश’ की असली वजह अब समझ में आ रही थी।

“पापा कहाँ खोये हो?” मेरी बेटी मेघा ने मुझे झकझोरते हुए कहा, “आज का पेपर काफ़ी अच्छा गया है। कम से कम अस्सी नंबर तो आने ही चाहिए।”

“बहुत बढ़िया। चलो अब घर चलें।” और हम बस स्टैंड की ओर चल पड़े।

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