Sep 15, 2016 · गीत
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आकाश पढ़ा करते हैं

बीती घटनाओं का इतिहास पढ़ा करते हैं
आजकल रोज़ हम आकाश पढ़ा करते हैं

ज़िंदगी दर्द है या दर्द का परिणाम है ये
व्यक्ति है आत्मा या देह का ही नाम है ये
इसी उधेड़बुन में नित्य पड़ा करते हैं
आजकल रोज़ हम आकाश पढ़ा करते हैं

अपने हर गीत की हर लय में उसे गाया है
उसको देखा तो नहीं किन्तु उसे पाया है
उसी अद्रुष्ट को छंदों में घड़ा करते हैं
आजकल रोज़ हम आकाश पढ़ा करते हैं

लाख मतभेद हों वैमत्य का सम्मान करें
प्रेम से सारी समस्या का समाधान करें
भाई-भाई हैं तो क्यों रोज़ लड़ा करते हैं
आजकल रोज़ हम आकाश पढ़ा करते हैं

‘चिराग़ बैसवारी’

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Deepesh Dwivedi
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साहित्य,दर्शन एवं अध्यात्म मे विशेष रुचि। 34 वर्षो से राजभाषा कार्मिक। गृहपत्रिका एवं सामयीकियों मे... View full profile
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