कविता · Reading time: 1 minute

=आओ प्रकृति की पूजा करें=

प्रकृति मित्र है मानव मात्र की,
वह संरक्षक है संसार की।
हमारी श्वास है वह, उच्छवास है वह,
जीवन का आधार है वह,
प्राण वायु की वाहक है वह।
प्रकृति ही बचाती है हमें विषैली हवाओं से,
बाढ़ों और बाधाओं से।
प्रकृति और मानव का,
चोली दामन का सा साथ है।
बिना प्रकृति के मनुष्य मानों अनाथ है।
फिर भी क्यों मूढ़ बुद्धि मानव,
बन रहा प्रकृति के लिए दानव।
जुटा हुआ है पर्यावरण को करने को बर्बाद,
करने के लिए अपने को आबाद।
कट रहे हैं वृक्ष दिनोंदिन,
नष्ट हो रहे नित दिन जंगल।
मानव उन पर बना घरौंदे,
मना रहा है आनंद मंगल।
इस बात से है वह भिज्ञ,
कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे अति विनाश कारी।
जिस का दंड भोगेगी मानवता सारी।
फिर क्या प्रकृति विनाश करना उसकी है लाचारी?
मेरी है करबद्ध ये विनती
आओ आज ये शपथ उठाएं,
हर व्यक्ति एक पौध लगाए।
उसे प्रतिदिन सींचे और लहलहाए,
बच्चे की तरह संभाले उसकी मां बन जाए।
पर्यावरण संरक्षण में अपना हाथ बंटाए।
तभी यह शत प्रतिशत संभव है,
कि हम अपनी प्राण वायु को संरक्षित कर पाएं।
अपने पर्यावरण को हम पुरातन काल की तरह सुदृढ़ कर पाएं।
हम भी प्रकृति को पूजें और उसका आशीष पाएं।

—-रंजना माथुर दिनांक 05/06/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
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