कविता · Reading time: 1 minute

आओ एक दूजे से कुछ सलाह मशविरा कर लेते है

आओ एक दूजे से कुछ
सलाह मशविरा कर लेते है
तुम हमारे, हम तुम्हारे
गुनाहों को ढक लेते है
एक को दो और
दो को चार पढ़ लेते है
आवाम को खिलौना
समझ लेते है ।
पांच साल तुम पांच साल
की हम शपथ लेते है
मिलकर खाएंगे ऐसा एक दूजे
को वचन लेतेे है ।
अपनी अपनी जेबें हम भर लेते है
आवाम को ऐसी ही ठक लेते है
विकास के गोरख धंधे को
चुनावों में झूठे वादों से हम भी
ढक लेते है ।

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M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।
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