Oct 26, 2020 · कविता
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*”आईना”*

*”आईना”*
आईना के सामने खड़े होकर जब निहार ,
खुद का ही व्यक्तित्व सामने आ जाता है।
ढूंढती है जो निगाहें ,वो आईना सब दिखला जाता है।
कभी तन्हाइयों में उदासीन चेहरा,
कभी हंसता नूरानी चेहरा निखर आता है।
आईना कभी चिढ़ाता ,कभी खुद की पहचान करा जाता है।
कभी झूठ बोल कर ,सच्चाई का सामना करा देता है।
ये आईना महज कांच का टुकड़ा नहीं,
व्यक्तित्व का प्रतिबिंब बता देता है।
आईना बोलता है कि कभी घमंड मत करना,
ये तन मन नश्वर शरीर होता है।
दर्प त्याग कर ये कांच चकनाचूर हो,
समूल नष्ट नाशवान होता है।
ऊंची उड़ान भरने का अहम का अंत होगा ,
फिर भी संसार क्यों अनजान होता है।
आलौकिक शक्तिशाली रंग रूप वर्ण ,
ये सारे धूमिल छबि हो जाते हैं।
प्रेम विश्वास बंधन के सहारे ही ,
जीवन की आस बंधी हुई है।
अपने ही आँखों से जब खुद को निहारते ,।
आईना सच्ची बात बयां कर जाता है।
अंतर्मन की व्यथा की व्याकुलता को ,
आईना प्रत्यक्ष प्रमाण बता देता है।
*आईना कभी झूठ नही बोलता है*
जय श्री कृष्णा राधे राधे 🙏🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷🔍🔎🔍🔎
*शशिकला व्यास*
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Shashi kala vyas
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एक गृहिणी हूँ पर मुझे लिखने में बेहद रूचि रही है। हमेशा कुछ न कुछ... View full profile
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